फ्लोटिंग आइकॉन

Showing posts with label guru grace. Show all posts
Showing posts with label guru grace. Show all posts

Friday, 2 October 2015

सा विद्या या विमुक्तये

प्रश्न—विद्यार्थी किसे कहते हैं ?
उत्तर—जो केवल विद्याध्ययन करना चाहता है, उसको विद्यार्थी करते हैं। ‘विद्यार्थी’ शब्द का अर्थ है—विद्या का अर्थी अर्थात् केवल विद्या चाहने वाला। कौन-सी विद्या ? विद्याओं में श्रेष्ठ ब्रह्मविद्या—‘अध्यात्मविद्या विद्यानाम्’ (गीता 10/32)

प्रश्न- विद्या का वास्तविक स्वरूप क्या है ?
उत्तर —कुछ भी जानना विद्या है। अनेक शास्त्रों का, कला-कौशलों का, भाषाओं आदि का ज्ञान विद्या है। वास्तव में विद्या वही है, जिससे जानना बाकी न रहे, जीवकी मुक्ति हो जाय—‘सा विद्या या विमुक्तये’ (विष्णुपुराण 1/19/41)। अगर जानना बाकी रह गया तो वह विद्या क्या हुई !

एक शब्दब्रह्म (वेद) है और एक परब्रह्म (परमात्मतत्त्व) है अगर शब्दब्रह्म को जान लिया, पर परब्रह्म को नहीं जाना तो केवल परिश्रम ही हुआ—



शब्दब्रह्मणि निष्णातो न निष्णायात् परे यदि।

श्रमस्तस्य श्रमफलो ह्यधेनुमिव रक्षतः।।
(श्रीमद्भा. 11/11/18)



अतः परमात्मतत्त्व को जानना ही मुख्य विद्या है और इसी में मनुष्यजीवन की सफलता है।
जिससे जीविका का उपार्जन हो, नौकरी मिले, वह भी विद्या है, पर वह विद्या परमात्मप्राप्ति में सहायक नहीं होती, प्रत्युत कहीं-कहीं उस विद्या का अभिमान होने से वह विद्या परमात्मप्राप्ति में बाधक हो जाती है। विद्या के अभिमानी को कोई ब्रह्मनिष्ठ महात्मा मिल जाय तो वह तर्क करके उनकी बात को काट देगा, उनको चुप करा देगा, जिससे वह वास्तविक लाभ से वञ्चित रह जायगा। अतः कहा गया है—



षडंगादिवेदो मुखे शास्त्रविद्या

कवित्वादि गद्यं सुपद्यं करोति । 
मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् 





‘छहों अंगोंसहित वेद और शास्त्रों को पढ़ा हो, सुन्दर गद्य और पद्ममय काव्य-रचना करता हो, पर यदि श्री गुरुदेव के चरणों में मन नहीं लगा तो उन सभी से क्या लाभ है ?’

प्रश्न—विद्या ग्रहण करने की क्या आवश्यकता है ?

उत्तर—विद्याके बिना मनुष्यजन्म सार्थक नहीं होगा, प्रत्युत मनुष्यजन्म और पशुजन्म एक समान ही होंगे। अतः विद्या की अत्यन्त आवश्यकता है।

कोई भी आरम्भ होता है तो वह किसी उद्देश्य को लेकर ही होता है। मनुष्यजन्म केवल दुःखों का अत्यन्ताभाव और परमानन्द की प्राप्ति के उद्देश्य से ही मिला है। इस उद्देश्य की सिद्धि अगर नहीं हुई तो मनुष्यता नहीं है। जैसे पशु-पक्षी आदि भोगयोनि है, ऐसे ही परमात्मप्राप्ति के बिना मनुष्य भी भोगयोनि ही है। कारण कि परमात्मप्राप्ति का अवसर प्राप्त करके भी मनुष्य केवल भोगों में लगा रहा तो वह भोगयोनि ही हुई। और उसका पतन ही हुआ— ‘तमारुढच्युतं विदुः’ (श्रीमद्भा. 11/7/74)।
यदि मनुष्य जन्म चौरासी लाख योनियों में जाने के लिये, बार-बार जन्मने-मरने के लिए ही हुआ तो फिर उसमें मनुष्यता क्या हुई ? अतः मनुष्य जन्म में विद्यार्थी को परमात्मा की प्राप्ति कर लेनी चाहिये, जिससे बढ़कर कोई लाभ नहीं—





यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते।।
 (गीता 6/22)



‘जिस लाभ की प्राप्ति होने पर उससे अधिक कोई दूसरा लाभ मानने में भी नहीं आता और जिसमें स्थित होने पर मनुष्य बड़े भारी दुःख से भी विचलित नहीं किया जा सकता।’

वास्तव में ब्रह्मविद्या ही विद्या है, अन्य विद्या तो अविद्या है। कारण कि ब्रह्मविद्या के प्राप्त होने पर कुछ भी प्राप्त करना बाकी नहीं रहता। परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि अन्य (लौकिक) विद्याएँ नहीं पढ़नी चाहिये। अन्य विद्याएँ भी पढ़नी चाहिये। अन्य भाषाओं, लिपियों आदि का ज्ञान-सम्पादन करना उचित है, पर उनमें ही लिप्त रहना उचित नहीं है; क्योंकि उनमें ही लिप्त रहने से मनुष्य जन्म निरर्थक चला जायगा। दूसरी बात, लौकिक विद्याओं को पढ़ने से ‘मैं पढ़ा-लिखा हूँ’—ऐसा एक अभिमान पैदा हो जाएगा, जिससे बन्धन और दृढ़ हो जायगा।



शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खा
यस्तु क्रियावान्पुरुषः स विद्वान्।



‘शास्त्रों को पढ़कर भी लोग मूर्ख बने रहते हैं। वास्तव में विद्वान वही है, जो शास्त्र के अनुकूल आचरण करता है।’

मनुष्य जन्म का उद्देश्य है—परमात्मतत्त्व की प्राप्ति करना और उसका साधन है—संसार की सेवा। अतः लौकिक विद्या, धन, पद आदि का उपयोगी संसार की सेवा में ही है। ये संसार की सेवा में ही काम आ सकते हैं, परमात्मप्राप्ति में नहीं, क्योंकि परमात्मप्राप्ति लौकिक विद्या के अधीन नहीं है। जिसके पास लौकिक विद्या आदि है, उसी पर संसार की सेवा करने की जिम्मेवारी है। मालपर ही जकात लगती है और इन्कम पर ही टैक्स लगता है। माल नहीं है तो जकात कि बात की ? इन्कम नहीं तो टैक्स किस बात का ?

लौकिक विद्या, धन, पद आदि को लेकर संसार में मनुष्य की जो प्रशंसा होती है, वह एक तरह से मनुष्य की निन्दा ही है। तात्पर्य है कि महिमा तो लौकिक विद्या आदि की ही हुई, खुदकी तो निन्दा ही है। अतः जो लौकिक विद्या आदि से अपने को बड़ा मानता है, वह वास्तव में अपने को छोटा ही बनाता है।


बापूजी के मित्र संत रामसुखदास महाराज के संकलन से उधृत 

ॐ ॐ गुरूजी ॐ 

brahm vidya self realization india asaram bapu god


Incidently my institute's motto is ज्ञानम् परमम् ध्येयम् jñānaṃ paramaṃ dhyeyam / ज्ञानं परमं ध्येयम् / GYaanaM paramaM dhyeyam (knowledge is the supreme goal).

I wonder how many inside IIT B know which gyan is being talked about .
hahahaha  sadhak has the last laugh !


बाह्य वस्तुओं का गहन ज्ञान ‘विज्ञान है और अंतस्तत्त्व-विषयक गहरा ज्ञान ‘तत्त्वज्ञान है ।


तीन प्रकार की विद्याएँ

तीन प्रकार की विद्याएँ होती हैं-
1.      लौकिक विद्याः जिसे हम स्कूल कालेज में पढ़ते हैं। यह विद्या केवल पेट भरने की विद्या है।
2.      योगविद्याः इस लोक और परलोक के रहस्य जानने कि विद्या।
3.      आत्मविद्याः आत्मा-परमात्मा की विद्या, परमात्मा के साक्षात्कार की विद्या, परमात्मा के साथ  एकता की विद्या।
लौकिक विद्या शारीरिक सुविधा के उपयोग में आती है। योगविद्या से इस लोक एवं परलोक के रहस्य खुलने लगते हैं एवं आत्मविद्या से परमात्मा के साथ एकता हो जाती है। जीवन में इन तीनों ही विद्याओं की प्राप्ति होनी चाहिए। लौकिक विद्या प्राप्त कर ली, किन्तु योगविद्या नहीं है तो जीवन में लौकिक चीजें बहुत मिलेंगी किन्तु भीतर शांति नहीं होगी। अशांति होगी, दुराचार होगा। लौकिक विद्या को पाकर थोड़ा कुछ सीख लिया, यहाँ तक कि बम बनाना सीख गये, फिर भी हृदय में अशांति की आग जलती रहेगी। अतः लौकिक विद्या के साथ आत्मविद्या अत्यावश्यक है।
जो लोग योगविद्या एवं आत्मविद्या का अभ्यास करते हैं, सुबह के समय थोड़ा योग का अभ्यास करते हैं, वे लोग लौकिक विद्या में भी शीघ्रता से सफल होते हैं। योग विद्या एवं ब्रह्मविद्या का थोड़ा सा अभ्यास करें तो लौकिक विद्या उनको आसानी से आ जाती है। लौकिक विद्या के अच्छे-अच्छे रहस्य वे लोग खोज सकते हैं।
जो वैज्ञानिक हैं वे भी जाने-अनजाने थोड़ा योगविद्या की शरण जाते हैं। रीसर्च करते-करते एकाग्र हो जाते हैं, तन्मय हो जाते हैं, तब कोई रहस्य उनके हाथ लगता है। वे ही वैज्ञानिक अगर योगी होकर रीसर्च करें तो आध्यात्मिक रहस्य उनके हाथ लग सकते है। योगियों ने ऐसे-ऐसे रीसर्च कर रखे हैं जिनका बयान करना भी आज के आदमी के वश की बात नहीं है।
नाभि केन्द्र पर ध्यान केन्द्रित किया जाये तो शरीर की सम्पूर्ण रचना ज्यों की त्यों दिखती है। योगियों ने शरीर को काटकूट कर (ऑपरेशन करके) भीतर नहीं देखा। वरन् उन्होंने स्थूल भौतिक शरीर को भी ध्यान की विधि से जाना है। यदि नाभि केन्द्र पर ध्यान स्थित करो तो तुम्हारे शरीर की छोटी-मोटी सब नाड़ियों की अदभुत रचना का पता चलेगा। योगियों ने ही खोज करके बताया है कि नाभि से कन्धे तक 72664 नाड़ियाँ हैं। ऐहिक विद्या से जिन केन्द्रों के दर्शन नहीं होते उन मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धाख्य, आज्ञा और सहस्रार चक्रों की खोज योगविद्या द्वारा ही हुई है। एक-एक चक्र की क्या-क्या विशेषताएँ हैं यह भी योगविद्या से ही खोजा गया है। उन चक्रों का रूपान्तर कैसे किया जाये यह भी योगविद्या के द्वारा ही जाना गया है।
यदि मूलाधार केन्द्र का रूपान्तरण होता है तो काम, राम में बदल जाता है। व्यक्ति की दृष्टि विशाल हो जाती है। उसके कार्य 'बहुजनहिताय बहुजनसुखाय' होने लगते हैं। ऐसा व्यक्ति यशस्वी हो जाता है। उसके पदचिह्नों पर चलने के लिए कई लोग तैयार होते हैं। जैसे – महात्मा गाँधी का काम केन्द्र राम में रूपान्तरित हुआ तो वे विश्वविख्यात हो गये।
दूसरा केन्द्र है स्वाधिष्ठान। उसमें भय, घृणा, हिंसा और स्पर्धा रहती है। यह दूसरा केन्द्र यदि रूपान्तरित होता है तो भय की जगह पर निर्भयता का, हिंसा की जगह अहिंसा का, घृणा की जगह प्रेम का और स्पर्धा की जगह समता का जन्म होता है। व्यक्ति दूसरों के लिए बड़ा प्यारा हो जाता है। अपने लिए एवं औरों के लिए बड़े काम का हो जाता है।
अपने शरीर में ऐसे सात केन्द्र हैं। इसकी खोज योगविद्या द्वारा ही हुई है। लौकिक विद्या ने इन केन्द्रों की खोज नहीं की। ऐसे ही, सृष्टि का आधार क्या है ? सृष्टिकर्त्ता से कैसे मिलें ? जीते जी मुक्ति का अनुभव कैसे हो ? यह खोज ब्रह्मविद्या के द्वारा ही हुई है।
लौकिक विद्या, योगविद्या और ब्रह्मविद्या। हम लोग लौकिक विद्या में तो थोड़ा-बहुत आगे बढ़ गये हैं लेकिन योग विद्या का ज्ञान नहीं है अतः व्यक्ति का शरीर जितना तंदुरूस्त होना चाहिए और मन जितना प्रसन्न एवं समझयुक्त होना चाहिए, वह नहीं है। इसीलिये चलचित्र देखकर कई ग्रेज्युएट व्यक्ति तक आत्महत्या कर लेते हैं। 'मरते हैं एक दूजे के लिए' फिल्म देखकर कई युवान-युवतियों ने आत्महत्या कर ली।
ऐहिक या लौकिक विद्या के साथ योग विद्या का सहारा नहीं है तो लौकिक विद्यावाला भी करप्शन (भ्रष्टाचार) करेगा। लड़ाई-झगड़े करके पेटपालु कुत्तों की नाई अपना जीवन बिताएगा। ऐहिक विद्या की यह एक बड़ी लाचारी है कि उसके होने के बावजूद भी जीवन में कोई सुख-शांति नहीं होती, शरीर का स्वास्थ्य और मन की दृढ़ता नहीं होती। आजकल की ऐहिक विद्या ऐसी हो गयी है कि विद्यार्थी गुलाम होकर ही युनिवर्सिटी से निकलते हैं। सर्टिफिकेट मिलने के बाद सर्विस की खोज में लगे रहते हैं। सर्विस मिलने पर कहते हैं-
'I am the best servant of Indian Government..... I am the best servant of British Government.'
आजकल की विद्या मनुष्य को Servant (नौकर) बनाती है। इन्द्रियों एवं मन का गुलाम बनाती है। ऐहिक विद्या मनुष्य को अहंकार का गुलाम बनाती है। ऐहिक विद्या मनुष्य को ईर्ष्या और स्पर्धा से नहीं छुड़ाती, काम-क्रोध की चोटों से नहीं बचाती। ऐहिक विद्या इन्सान को लोक-लोकान्तर की गतिविधियों का ज्ञान नहीं कराती। ऐहिक विद्या आदमी को पेट पालने के साधन प्रदान करती है, शरीर की सुविधाएँ बढ़ाने में मदद करती है। मनुष्य शरीर की सुविधाओं का जितना अधिक उपयोग करता है उतनी ही लाचारी उसके चित्त में घुस जाती है। शारीरिक सुविधाएँ जितनी भोगी जाती हैं और योगविद्या की तरफ जितनी लापरवाही बर्ती जाती है उतना ही मनुष्य अशांत होता जाता है। पाश्चात्य जगत् ने ऐहिक विद्या में, तकनीक के जगत में खूब तरक्की की किन्तु साथ ही साथ अशान्ति भी उतनी ही बढ़ी।
ऐहिक विद्या में अगर योग का संपुट दिया जाये तो मनुष्य ओजस्वी तेजस्वी बनता है। ऐहिक विद्या का आदर करना चाहिए किन्तु योगविद्या और आत्मविद्या को भूलकर ऐहिक विद्या में ही पूरी तरह से लिप्त हो जाना मानो अपने ही जीवन का अनादर करना है। जिसने अपने जीवन का ही अनादर कर दिया वह जीवनदाता का आदर कैसे कर सकता है ? जो अपने जीवन का एवं जीवनदाता का आदर नहीं कर सकता वह पूर्ण सुखी भी कैसे रह सकता है ?
ऑटोरिक्शा में तीन पहिये होते हैं। आगेवाला पहिया ठीक है, पीछे एक पहिया नहीं है और आगे वाला स्टीयरिंग नहीं है तो ऑटोरिक्शे की बॉडी (ढाँचा) दिखेगी, लेकिन उससे यात्रा नहीं होगी। ऐसे ही जीवन में ऐहिक विद्या तो हो, लेकिन उसके साथ योगविद्यारूपी पहिया न हो और ब्रह्मविद्यारूपी स्टीयरिंग न हो तो फिर मनुष्य अविद्या में ही उत्पन्न होकर, अविद्या में ही जीकर, अंत में अविद्या में ही मर जाता है। जैसे व्हील और स्टीयरिंग रहित ऑटोरिक्शा वहीं का वहीं पड़ा रहता है वैसे ही मनुष्य अविद्या में ही पड़ा रह जाता है, माया में ही पड़ा रह जाता है। माताओं के गर्भों में उल्टा लटकता ही रहता है, जन्म मरण के चक्र में फँसता ही रहता है क्योंकि ऐहिक विद्या के साथ-साथ ब्रह्मविद्या और योग विद्या नहीं मिली।
ऐहिक विद्या को पाने का तो एक निश्चित समय होता है किन्तु योग विद्या को, ब्रह्मविद्या को पाने के लिए दस-पन्द्रह या बीस वर्ष की अवधि नहीं होती। ऐहिक विद्या के साथ-साथ योगविद्या और ब्रह्मविद्या चलनी ही चाहिए। यदि मनुष्य प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में (साढ़े तीन बजे) उठकर योगविद्या का, ध्यान का अभ्यास करे तो उस समय कया हुआ ध्यान बहुत लाभ करता है।
जो लोग ब्रह्ममुहूर्त में जाग जाते हैं वे बड़े तेजस्वी होते हैं। जीवन की शक्तियाँ ह्रास होने का और स्वप्नदोष होने का समय प्रायः ब्रह्ममुहूर्त के बाद का ही होता है। जो ब्रह्ममुहूर्त में जाग जाता है उसके ओज की रक्षा होती है। जो ब्रह्ममुहूर्त में जगकर ध्यान के अभ्यास में संलग्न हो जाता है उसको जल्दी ध्यान लग जाता है। जिसका ध्यान लगने लगता है उसके बल, ओज, बुद्धि एवं योगसामर्थ्य बढ़ते हैं और आत्मज्ञान का मार्ग उसके लिए खुला हो जाता है।
सूर्योदय से दो पाँच मिनट पहले और दो पाँच मिनट बाद का समय संधिकाल है। इस समय एकाग्र होने में बड़ी मदद मिलती है। यदि ब्रह्ममुहूर्त में उठकर ध्यान करे, सूर्योदय के समय ध्यान करे, ब्रह्मविद्या का अभ्यास करे तो.... शिक्षकों से थोड़ी लौकिक विद्या तो सीखे किन्तु दूसरी विद्या उसके अंदर से ही प्रगट होने लगेगी। जो योगविद्या और ब्रह्मविद्या में आगे बढ़ते हैं उनको लौकिक विद्या बड़ी आसानी से प्राप्त होती है।
संत तुकाराम लौकिक विद्या पढ़ने में इतना समय न दे सके थे किन्तु उनके द्वारा गाये गये अभंग बम्बई यूनिवर्सिटी के एम. ए. के विद्यार्थियों को पढ़ाये जाते हैं।
संत एकनाथजी लौकिक विद्या भी पढ़े थे, योगविद्या भी पढ़े थे। विवेकानंद लौकिक विद्या पढ़े थे, योगविद्या भी पढ़े थे। उन्होंने आत्मविद्या का ज्ञान भी प्राप्त किया था। जो लौकिक विद्या सीखा है और उसे योगविद्या मिल जाये तो उसके जीवन में चार चाँद लग जाते हैं। उसके द्वारा बहुतों का हित हो सकता है।
योगविद्या एक बलप्रद विद्या है। वह बल अहंकार बढ़ाने वाला नहीं, वरन् जीवन के वास्तविक रहस्यों को प्रगटाने वाला और सदा सुखी रहने के काम आने वाला है। अगर मनुष्य के पास योग बल नहीं है तो फिर उसके पास धनबल, सत्ताबल और बाहुबल हो तो भी वह उस बल का क्या कर डाले ? कोई पता नहीं। सत्ता और धन का कैसा उपयोग करे ? कोई पता नहीं। जीवन में यदि योगविद्या और ब्रह्मविद्या साथ में हो तो...... भगवान राम के पास लौकिक विद्या के साथ योगविद्या और ब्रह्मविद्या थी तो हजारों विघ्न-बाधाओं के बीच भी उनका जीवन बड़ी शांति, बड़े आनंद और बड़े सुख से बीता, बड़ी समता से व्यतीत हुआ। श्रीकृष्ण के जीवन में लौकिक विद्या, योगविद्या और ब्रह्मविद्या तीनों थीं। उनके जीवन में भी हजारों विघ्न-बाधाएँ आयीं लेकिन वे सदा मुस्कुराते रहे।
जितने अंश में योगविद्या और ब्रह्मविद्या है, उतने अंश में ऐहिक विद्या भी शोभा देती है। किन्तु केवल लौकिक विद्या है, योगविद्या और ब्रह्मविद्या नहीं है तो फिर ऐहिक विद्या के प्रमाणपत्र मिल जाते हैं। उसे कुछ धन या कुछ सत्ता मिल जाती है किन्तु गहराई से देखो त भीतर धुंधलापन ही रहता है। भीतर कोई तसल्ली नहीं रहती, कोई तृप्ति नहीं रहती, कोई शांति नहीं रहती। भविष्य कैसा होगा ? कोई पता नहीं। आत्मा क्या है ? कोई पता नहीं। मोक्ष क्या है ? कोई पता नहीं। जीवन अज्ञान में ही बीत जाता है।
अज्ञान में जो ज्ञान होता है वह भी अज्ञान का रूपान्तर होता है। जैसे, रस्सी में साँप दिखा तो कोई बोलता है - 'यह साँप है।' दूसरा बोलता है - 'यह साँप नहीं यह तो दरार है।' तीसरा बोलता है -'यह दरार नहीं, यह तो पानी का बहाव है।' चौथा बोलता है - 'यह मरा हुआ साँप है।' कोई बोलता है - 'अच्छा, जाऊँ, जरा देखूँ।' वह जाता तो है किन्तु दोनों तरफ भागने की जगह खोजता है। अज्ञान में ज्ञान हुआ है। रस्सी में साँप का ज्ञान हुआ है। ऐहिक विद्या अविद्या में ही मिलती है। अज्ञान दशा में ही ऐहिक शिक्षा का समावेश होता है।
आत्मा का ज्ञान नहीं है। आत्मा-परमात्मा क्या है ? उसका ज्ञान नहीं है और हम लौकिक शिक्षा पाते हैं तो अज्ञान दशा में जो कुछ जाना जाता है, वह अज्ञान के अन्तर्गत ही होता है। हकीकत में जानकारी मिलती है बुद्धि को और समझते हैं कि हम जानते हैं। हम डॉक्टर हो गये तो बुद्धि तक, वकील हो गये तो बुद्धि तक, उद्योगपति हो गये तो बुद्धि तक। लेकिन बुद्धि के पार की जो विद्या है वह है ब्रह्मविद्या।
जहाँ से विश्व की तमाम बुद्धियों को, दुनिया के बड़े-बड़े वैज्ञानिकों की बुद्धियों को, बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों की, साधु-संतों की बुद्धियों को प्रकाश मिलता है उस प्रकाश के ज्ञान को ब्रह्मज्ञान कहते हैं। जहाँ से विश्व को अनादिकाल से ज्ञान मिलता आ रहा है.... चतुरों की चतुराई, विद्वानों की विद्या संभालने की योग्यता, प्रेम, आनंद, साहस, निर्भयता, शक्ति, सफलता, इस लोक और परलोक के रहस्यों का उदघाटन करने की क्षमता..... ये सब जहाँ से मिलता आया है, मिल रहा है और मिलता रहेगा एवं एक तृण जितनी भी जिसमें कमी नहीं हुई, उसे कहते हैं ब्रह्म परमात्मा। ब्रह्म-परमात्मा को, आत्मा को जानने की विद्या को ही ब्रह्मविद्या कहते हैं।
ब्रह्मविद्या ब्रह्ममुहूर्त में बड़ी आसानी से फलती है। उस समय ध्यान करने से, ब्रह्मविद्या का अभ्यास करने से, मनुष्य बड़ी आसानी से प्रगति कर सकता है। सुबह का समय ध्यान का समय है। व्यक्ति जितने अंश में ध्यान में सफल होता है उतनी ही लौकिक विद्या में भी अच्छी प्रगति कर सकता है।
लौकिक विद्या तो जरूर पढ़ो, किन्तु साथ ही साथ योग विद्या और आत्मविद्या का अभ्यास भी करोगे तो जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त कर सकोगे। फिर महान् बनना तुम्हारे लिए अत्यंत सहज एवं सरल हो जायेगा।


वर्चोदा ऽ असिवर्चो मे देहि  - शुक्लयजुर्वेद - ४.३
हे परमेश्वर ! आप विद्या व ब्रह्मतेज -प्रदाता हैं म मुझे भी विज्ञान व ब्रह्मतेज प्रदान  कीजिए 

Saturday, 15 August 2015

मेरे बापूजी खाली तीसरी पढ़े हैं !!




पुराने सत्संगी जो हमेशा आते रहते है शिविरों में, उनको पता है कि बापूजी कई बार बोलते रहते है “हम तो खालीतीसरी क्लास पढ़े है” , “हम तो भाई खाली तीसरी पढ़े है” | अब तीसरी पढ़े है उसकी बातें आज मैं आपको बताना चाहता हूँ | तीसरी पढ़े है मतलब:
ज्यों केले के पात पात में पात,
त्यों सदगुरु की बात बात में बात |

भक्ति, योग और ज्ञान | भक्तिमार्ग, ज्ञान मार्ग, निष्काम कर्मयोग का मार्ग | इन तीनों से जो विभूषित है,
कोईकोई महापुरुष भक्ति मार्ग से ईश्वर को पाये है, कोई ज्ञान मार्ग से पाये है, कोईनिष्काम कर्म योग के मार्ग से पाये है पर अपने गुरुदेव के पास ये तीनों है |इसलिये ज्ञानमार्गी साधकों को भी लाभ मिलता है जो भक्तिमार्गी होते है उनको भी लाभमिलता है और जो निष्काम कर्ममार्गी होते है, उनको भी लाभ होता है | सबको लाभ होताहै |
सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण | इन तीनोसे पार ! तीसरी पढ़े है ! बापूजी नहीं कहते है ! तीनों से पार ! देखो अब आपको एक बातबताऊँ, जनम और मरण क्यों होता है ? चौरासी लाख योनियों में जीव क्यों जाता है ?
जाना पड़ता है ये बात पक्की है | गीता में लिखा हुआ है इसमें कोई ना नहीं कह सकता |ना बोले तो कोई बात नहीं, जायेगा तब पता चल जायेगा | चार पैर वाला बनेगा तब पता चलजायेगा | तब झक मार के मानेगा पर तब गीता नहीं पढ़ सकेगा | तब माला नहीं घुमा सकेगा| तब दीक्षा लेने नहीं बैठ सकेगा | जो लोग बोलते है न कि अरे ये सब बाते है, कुछनहीं है इन सब बातों में, नहीं माना करो, सब बकवास है, ढकोसला है | भगवान ऐसे लोगोंके लिए बोलते है तू इधर आ मैं तुझे दिखाऊंगा क्या बकवास है क्या ढकोसला है ? सत्वगुण,तमोगुण, रजोगुण, इनमे जो उलझते रहते है उसके कारण जनम मरण होता है | कोई कोईसत्वगुण में भी उलझते है कि मैं चार बजे उठ जाता हूँ | ये लोग तो आलसी है छः बजेउठते है | छः बजे तक तो मैं मेरा नियम पूरा कर लेता हूँ | पर मेरे दूसरे साथी है न! सब आलसी है, आठ बजे तक नियम पूरा होता है उनका | तो ये क्या है | सत्वगुण में भीबंध गए कि मैं नियम करता हूँ चार बजे उठकर | ये सत्वगुण में बंधना है पर गुरुदेवचाहते है, गुरुदेव स्वयं तो पार तीनों गुणों से है ही पर अपने साधकों को भी तीनोगुणों से पार ले जाना चाहते है |

तीसरी बात प्रकृति में तीन दोष है : आधि, व्याधि और उपाधि | आधिमाने लोगों में देखो मन का रोग, टेंशन, चिंता | व्याधि शरीर का रोग | उपाधि मैंफलाना ! मैं फलाना ! मैं फलाना ! पर गुरुदेव तीनों से पार ! आधि व्याधि उपाधि औरअपने साधकों को भी बापू आधि, व्याधि और उपाधि तीनों से पार ले जाना चाहते है | नमन में आधि रहे न शरीर में व्याधि रहे न मैं बड़ा अफसर हूँ ! मैं बड़ा अधिकारी हूँ !मैं बड़ा सेठ हूँ ! इन सबसे पार ले जाना चाहते है |

चौथी बात कि तीन मुख्य पाश है एक तो द्वेष, दूसरा लोभ और तीसरा मोह| ये तीन जिसमे बढते जाते है उसका मन चंचल बना रहता है और ये तीन जिसमे घटतेजाते है उसका मन स्थिर होता जाता है और ये तीन जिसमे है या तीन में से एक भी है तोसमझो मन में पशुता आ गयी है | द्वेष पशुता है, मोह पशुता है, लोभ पशुता है | मनमें पशुता आई तो शरीर भी पशु का मिलने ही वाला है | समझो अब तैयारी है | मन में आ गयी न तो अब तन में भी आएगी | गुरुदेवद्वेष, लोभ और मोह इन तीनों से हमको भी पार ले जाना चाहते है |


पांचवी बात तीन लोक है : इस लोक में कुछ सुखभोग के साधन है फिर मरने के बाद परलोक में जो कुछसुखभोग के साधन है, स्वर्ग आदि ऊँचे लोकों में और तीसरा व्यक्ति का अपना मनः लोकभी होता है | काल्पनिक सृष्टि | जैसे स्वर्ग के बारे में सुना है तो सोचते है कि दानपुण्य करो मरने के बाद स्वर्गलोक मिलेगा पर गुरुदेव के साधक स्वर्ग की भी इच्छानहीं करते | क्यों? उससे भी पार जाना है |

छठी बात शरीर की तीन प्रकृतियाँ है: जो मन पर असर डालती है वात, पित्त और कफ | तुलसीदासजी ने मानस रोगों में कहाहै:
काम वात कफ लोभ अपारा |
क्रोध पित्त नित छाती जारा ||
ये आदमी को सताते रहते है | गुरुदेव की कृपा से और उनके बताये हुए उपायों से शरीर में भी वात, पित्त, कफ का संतुलन रहताहै और इन तीनों की विकृति से उत्पन्न जो रोग है उसपर भी नियंत्रण हो जाता है | वात,पित्त, कफ का बेलेंस रहा तो इन तीन का भी संतुलन रहा |


फिर सातवीं बात की सर्दी गर्मी और बरसात तीन ऋतुएँ है न ! इन तीनों ऋतुओं में भीसम रहो , सर्दी में भी सम रहो, कई लोग बोलते है कि सर्दी की सीजन में तो ठिठुरतेरहो… स्वेटर पहनो, कम्बल ओढ़ो, गरम पानी करो.. ये करो… वो करो… झंझट बहुत है| कोई बोले नहीं नहीं ! गर्मी की ऋतु मेंबहुत परेशानी है, कोई बोले बरसात की ऋतु में परेशानी है पर गुरुदेव कहते है तुम इनतीनो के साक्षी बनो और तीनों में सम रहो और पार हो जाओ |
आठवी बात गुरुदेव चाहते है हमारे जीवन में भी ध्याता, ध्यान और ध्येय! दृष्टा, दर्शन और दृश्य ! कर्ता, करण और कर्म ! प्रमाता,प्रमाण और प्रमेय ! भक्ति, भक्त और भगवान ! इन तीनों की त्रिपुटी सेबापूजी पार है और हमको भी पार ले जाना चाहते है | ऐसा नहीं कि बस मैं ध्यान करता रहूँ तो किसका ? ध्यान किया गया, ध्याता करनेवाला, ध्येय जिसका कर रहे है तो ये तीन तो बने रहे | गुरुदेव चाहते है कि ये तीन नरहे | अद्वैत का अनुभव हो जाये |

भूत, भविष्य और वर्तमान नौवी बात | जैसेगुरुवन्दना में गाते है न“जय काल अबाधित…” कालका प्रभाव जिनके ऊपर नहीं है | कालातीत तत्व में जो जगे है, गुरुदेव हमको भी उसमेले जाना चाहते है | न भूतकाल की बातें सोचते रहें न वर्तमान में कुछ न भविष्य कीकल्पना | इससे पार हो जाएँ ताकि वर्तमान भी बढ़िया रहे, भविष्य भी बढ़िया रहे | इसमें उलझे न रहे कि मेरा वर्तमान अच्छा हो ताकिमेरा भविष्य भी अच्छा हो जाये | खाली इसी में ही उलझे नहीं रहना है, इससे पार हो जाओकालातीत तत्व में गुरुदेव हमें जगाना चाहते है |

और तीसरी पढ़े है का एक ये भी है कि गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुगुरुर्देवो महेश्वर… ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का जो……. वहां शब्दनहीं जा सकते….. शब्द वहाँ छोटे पड़ जाते है | इस प्रकार गुरुदेव हमें इन तीनों सेले जाना चाहते है पार ! सोचो कितनी ऊँची उपलब्धि गुरुदेव कराना चाहते है !


भगवत्पाद साँईं श्री लीलाशाहजी की मिठाई


पूज्य बापू जी का सदगुरु संस्मरण
मेरे गुरु जी का आश्रम नैनिताल में था। एक बार गुरु जी के साथ सामान लेकर एक कुली आश्रम में आया।
गुरु जी ने कहाः "अरे आशाराम !"
मैंने कहाः "जी साँईं !"
"रस्सी लाओ। इसको बाँधना है।"
"जी साँईं लाता हूँ।"
गुरु जी अपनी कुटी में गये और मैं रस्सी लाने का नाटक करने लगा। वह कुली तो घबरा गया। जो दो रूपये लेने को बोल रहा था, वह रुपये लिए बिना ही चले जाने का विचार करने लगा। मैंने उसे रोका और कहाः "अरे, खड़ा रहा।"
कुली ने पूछाः "भाई ! क्या बात है ?" मैंने कहाः "अरे भाई ! खड़ा रहा। गुरु जी ने बाँधने की आज्ञा दी है।"
इतने में गुरु जी आये और कुली से कहने लगेः "इधर आ... इधर आ ! ले यह मिठाई। खाता है कि नहीं ? नहीं तो वह आशाराम तुझे बाँध देगा।"
उसने तो जल्दी-जल्दी मिठाई खाना शुरु कर दिया। साँईं बोलेः "खा, चबा-चबाकर खा। खाना जानता है कि नहीं ?"
उसने कहाः "बाबा जी ! जानता हूँ।"
साँईं ने कहाः "अरे आशाराम ! यह तो खाना जानता है। इसे बाँधना नहीं।"
मैंने कहाः "जी साँईं !"
साँईं ने पुनः कहाः "आशाराम ! यह तो मिठाई खाना जानता है। चबा-चबाकर खाता है।" फिर उसकी तरफ देखकर बोलेः "यह मिठाई घर ले जा। दो दिन तक थोडी-थोड़ी खाना। मिठाई कैसी लगती है ?"कुली ने कहाः "बाबाजी ! मीठी लगती है।" साँईं बोलेः "हाँ... लीलाशाह की मिठाई है। सुबह में भी मीठी और शाम को भी मीठी, दिन को भी मीठी और रात को भी मीठी। लीलाशाहजी की मिठाई जब खाओ तब मीठी।"कुली भले अपने ढंग से समझा होगा परंतु हम तो समझ रहे थे कि पूज्य श्री लीलाशाहजी बापू का ज्ञान जब विचारो तब मधुर-मधुर। ज्ञान भी मधुर और ज्ञान देने वाले भी मधुर तो ज्ञान लेने वाला मधुर क्यों न हो जाय ?
ज्यों केले के पात में, पात-पात में पात।
त्यों संतन की बात में, बात-बात में बात।।



Sunday, 10 May 2015

Shri Guru Paduka Stotram by Adi Shankara

।। गुरुपादुकास्तोत्रम् ।।

अनन्तसंसारसमुद्रतारनौकायिताभ्यां गुरुभक्तिदाभ्याम्।
वैराग्यसाम्राज्यदपूजनाभ्यामं नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम्।।1।।

कवित्ववाराशिनिशाकराभ्यां दौर्भाग्यदावाम्बुदमालिकाभ्याम्।
दूरीकृतानम्रविपत्तिताभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम्।।2।।

नता ययोः श्रीपतितां समीयुः कदाचिदप्याशु दरिद्रवर्याः।
मूकाश्च वाचस्पतितां हि ताभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम्।।3।।

नालीकनीकाशपदाहृताभ्यां नानाविमोहादिनिवारिकाभ्याम्।
नमज्जानभीष्टततिब्रदाभ्यां नमोः नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम्।।4।।

नृपालिमौलिब्रजरत्नकान्तिसरिद्वराज्झषकन्य­काभ्याम्।
नृपत्वदाभ्यां नतलोकपङ्क्तेः नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम्।।5।।

पापान्धकारार्कपरम्पराभ्यां तापत्रयाहीन्द्रखगेश्वराभ्याम्।
जाड्याब्धिसंशोषणवाडवाभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम्।।6।।

शमादिषट्कप्रदवैभवाभ्यां समाधिदानव्रतदीक्षिताभ्याम्।
रमाधवाङिघ्रस्थिरभक्तिदाभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम्।।7।।

स्वार्चपराणामखिलेष्टदाभ्यां स्वाहासहायाक्षधुरन्धराभ्याम्।
स्वान्ताच्छभावप्रदपूजनाभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम्।।8।।

कामादिसर्पव्रजगारुडाभ्यां विवेकवैराग्यनिधिप्रदाभ्याम्।
बोधप्रदाभ्यां द्रुतमोक्षदाभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम्।।9।।

ૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐ
There is one more prayer written by Adi Shankara Bhagawat pada with five verses called “Guru Paduka Panchakam”.
Anantha samsara samudhra thara naukayithabhyam guru bhakthithabhyam,
Vairagya samrajyadha poojanabhyam, namo nama sri guru padukhabyam., 1
Salutations and Salutations to the sandals of my Guru,
Which is a boat, which helps me,cross the endless ocean of life,
Which endows me, with the sense of devotion to my Guru,
And by worship of which, I attain the dominion of renunciation
Kavithva varasini sagarabhyam, dourbhagya davambudha malikabhyam,
Dhoorikrutha namra vipathithabhyam,, namo nama sri guru padukhabyam., 2
Salutations and Salutations to the sandals of my Guru,
Which is the ocean of knowledge, resembling the full moon,
Which is the water, which puts out the fire of misfortunes,
And which removes distresses of those who prostrate before it.
Natha yayo sripatitam samiyu kadachidapyasu daridra varya,
Mookascha vachaspathitham hi thabhyam,namo nama sri guru padukhabyam.3
Salutations and Salutations to the sandals of my Guru,
Which make those who prostrate before it,
Possessors of great wealth, even if they are very poor,,
And which makes even dumb people in to great orators.
Naleeka neekasa pada hrithabhyam, nana vimohadhi nivarikabyam,
Nama janabheeshtathathi pradhabhyam namo nama sri guru padukhabyam., 4

Salutations and Salutations to the sandals of my Guru,
Which attracts us, to lotus like feet of our Guru,
Which cures us, of the unwanted desires,
And which helps fulfill the desires of those who salute.
Nrupali mouleebraja rathna kanthi sariddha raja jjashakanyakabhyam,
Nrupadvadhabhyam nathaloka pankhthe, namo nama sri guru padukhabyam., 5

Salutations and Salutations to the sandals of my Guru,
Which shine like gems on the crown of a king,
Which shine like a maid in the crocodile infested stream,
And which make the devotees attain the status of a king.
Papandhakara arka paramparabhyam, thapathryaheendra khageswarabhyam,
Jadyadhi samsoshana vadaveebhyam namo nama sri guru padukhabyam., 6

Salutations and Salutations to the sandals of my Guru,
Which is like a series of Suns, driving away the dark sins,
Which is like the king of eagles, driving away the cobra of miseries,
And which is like a terrific fire drying away the ocean of ignorance. 
Shamadhi shatka pradha vaibhavabhyam,Samadhi dhana vratha deeksithabhyam,
Ramadhavadeegra sthirha bhakthidabhyam, namo nama sri guru padukhabyam.7
Salutations and Salutations to the sandals of my Guru,
Which endows us, with the glorious six qualities like sham,
Which gives the students ,the ability to go in to eternal trance,
And which helps to get perennial devotion to the feet of Vishnu.
Swarchaparana makhileshtathabhyam, swaha sahayaksha durndarabhyam,
Swanthachad bhava pradha poojanabhyam, namo nama sri guru padukhabyam., 8
Salutations and Salutations to the sandals of my Guru
Which bestows all desires of the serving disciples,
Who are ever involved in carrying the burden of service
And which helps the aspirants to the state of realization.
Kaamadhi sarpa vraja garudabhyam, viveka vairagya nidhi pradhabhyam,
Bhodha pradhabhyam drutha mokshathabhyam, namo nama sri guru padukhabyam., 9
Salutations and Salutations to the sandals of my Guru
Which is the Garuda,which drives away the serpent of passion,
Which provides one, with the treasure of wisdom and renunciation,
Which blesses one,with enlightened knowledge,
And blesses the aspirant with speedy salvation.

ॐ ॐ गुरुजी ॐ 


Wednesday, 1 April 2015

जाएँ कहाँ बच्चे .....?

                   


ॐ ॐ ॐ बापू जल्दी बाहर आएँ 

यह संकल्प हमारा 
 जल्दी दरश दिखाएँ 

भक्तों  केलिए आपने कितने कष्ट सहे 
जब जब आपको पुकारा दौड़े चले आए 

मात  पिता तुम मेरे बंधू सखा तुम्ही 

तुम बिन कौन हमारा 
 विनती सुन लीजिए मेरी 

बापू जल्दी बाहर आएँ 

ज्ञान भक्ति माय अमृत आपने हमको दिया
निंदा अपयश जैसे विष को स्वयं पिया 

बापू जल्दी बाहर  आएँ 

संस्कृति रक्षा हेतु है अवतार लिया 

दोष रहित हो कर भी 
बंधना स्वीकार किया

करुना सागर गुरुवार लीला कर ये रहे 
अंतर्यामी होकर  सबकुछ देख रहे 

बापू जल्दी बहार आएँ 
 तुमसे हम  हैं बापू और न कोई जग में 
 तुम भी दूर हुए तो 

जाएँ कहाँ बच्चे ....?
 बापू जल्दी बहार आएँ 

भक्त पुकारें बापू अब तो दरश दिखाओ 
राह  निहारें हम सब अब न तड़पाएँ 

बापू जल्दी बाहर  आएँ

Monday, 16 February 2015

महाशिवरात्रि

यो गुरु स शिवः प्रोक्तो, यः शिवः स गुरुस्मृतः |
विकल्पं यस्तु कुर्वीत स नरो गुरुतल्पगः ||

जो गुरु हैं वे ही शिव हैं, जो शिव हैं वे ही गुरु हैं | दोनों में जो अन्तर मानता है वह गुरुपत्नीगमन करनेवाले के समान पापी है |

He who is the Guru is Shiva Himself, so declare the scriptures, and the fact that Shiva is the Guru, is reminded to us in all the Smritis. He, who makes any distinction between the two, is guilty of the crime of uniting with his own Guru’s wife.
Guru gita 1.18

२०१३ में शिवरात्रि की रात मैं ब्रह्मपुत्र एक्सप्रेस से महाकुम्भ मेले में बापूजी के दर्शन करके आरहा था | ट्रेन में हिलने तक की जगह नहीं थी , सुबह ५ बजे कानपूर आया और शाम ५ बजे के खड़े खड़े तब लेटे |

२०१४ में आग्नेय शैल विज्ञान की सूक्ष्मदर्शी परीक्षा थी |

Bapuji mahakumbh 2013
Prayag Mahakumbh 2013 




देवाधिदेव महादेव जी ने श्री वशिष्ठजी से कहाः 'हे मुनीश्वर ! इस जगत में ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र जो बड़े देवता हैं वे सब सर्वसत्ता रूप एक ही आत्मदेव से प्रकट हुए हैं। सबका मूल बीज वही देव है। जैसे अग्नि से चिनगारी और समुद्र से तरंगे उपजते हैं वैसे ही ब्रह्मा से लेकर कीट पर्यन्त सभी उसी आत्मदेव से उपजते हैं और पुनः उसी में लीन होते हैं। सब प्रकाशों का प्रकाश और तत्त्ववेत्ताओं का पूज्य वही है।
हे मुनिशार्दूल ! जरा, मृत्यु, शोक और भय को मिटाने वाला आत्मदेव ही सबका सार और सबका आश्रय रूप है। उसका जो विराट रूप है वह कहता हूँ, सुनो। वह अनन्त है। परमाकाश उसकी ग्रीवा है। अनेक पाताल उसके चरण हैं। अनेक दिशाएँ उसकी भुजा हैं। सब प्रकाश उसके शास्त्र हैं। ब्रह्मा, विष्णु, रूद्रादि देवता और जीव उसकी रोमावली है। जगज्जाल उसका विवृत है। काल उसका द्वारपाल है। अनन्त ब्रह्माण्ड उसकी देह के किसी कोण में स्थिति है। वही आत्मदेव शिवरूप सर्वदा और सबका कर्त्ता है, सब संकल्पों के अर्थ का फलदाता है। आत्मा सबके हृदय में स्थित है।
हे ऋषिवर्य ! अब मैं वह आत्म-पूजन कहता हूँ जो सर्वत्र पवित्र करने वाले को भी पवित्र करता है और सब तम और अज्ञान का नाश करता है। आत्मपूजन सब प्रकार से सर्वदा होता है और व्यवधान कभी नहीं पड़ता। उस सर्वात्मा शान्तरूप आत्मदेव का पूजन ध्यान है और ध्यान ही पूजन है। जहाँ-जहाँ मन जाय वहाँ-वहाँ लक्ष्य रूप आत्मा का ध्यान करो। सबका प्रकाशक आत्मा ही है। उसका पूजन दीपक से नहीं होता, न धूप, पुष्प, चन्दनलेप और केसर से होता है। अर्घ्य पाद्यादिक पूजा की सामग्रियों से भी उस देव का पूजन नहीं होता।
हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ ! एक अमृतरूपी जो बोध है, उससे उस देव का सजातीय प्रत्यय ध्यान करना ही उसका परम पूजन है। शुद्ध चिन्मात्र आत्मदेव अनुभव रूप है। सर्वदा और सब प्रकार उसका पूजन करो अर्थात् देखना, स्पर्श करना सूँघना, सुनना, बोलना, देना, लेना, चलना, बैठना इत्यादि जो कुछ क्रियाएँ हैं, सब चैतन्य साक्षी में अर्पण करो और उसी के परायण बनो। आत्मदेव का ध्यान करना ही धूप-दीप और पूजन की सामग्री है। ध्यान ही उस परमदेव को प्रसन्न करता है और उससे परमानन्द प्राप्त होता है। अन्य किसी प्रकार स वह देव प्राप्त नहीं होता।
हे मुनीश्वर ! मूढ़ भी इस प्रकार ध्यान से उस ईश्वर की पूजा करे तो त्रयोदश निमेष में जगत-दान के फल को पाता है। सत्रह निमेष के ध्यान से प्रभु को पूजे ते अश्वमेध यज्ञ के फल को पाता है। केवल ध्यान से आत्मा का एक घड़ी पर्यन्त पूजन करे तो राजसूय यज्ञ के फल को पाता है और जो दिनभर ध्यान करे तो असंख्य अमित फल पाता है। हे महर्षे ! यह परम योग है, यही परम क्रिया है और यही परम प्रयोजन है।
यथा प्राप्ति के समभाव में स्नान करके शुद्ध होकर ज्ञान स्वरूप आत्मदेव का पूजन करो। जो कुछ प्राप्त हो उसमें राग-द्वेष से रहित होना और सर्वदा साक्षी का रूप अनुभव में स्थित रहना ही उसका पूजन हो। जो नित्य, शुद्ध, बोधरूप और अद्वैत है उसको देखना और किसी में वृत्ति न लगाना ही उस देव का पूजन है। प्राण अपानरूपी रथ पर आरूढ़ जो हृदय में स्थित है उसका ज्ञान ही पूजन है।
आत्मदेव सब देहों में स्थित है तो भी आकाश-सा निर्लिप्त निर्मल है। सर्वदा सब पदार्थों का प्रकाशक, प्रत्यक् चैतन्य जो आत्मतत्त्व अपने हृदय  स्थित है वही अपने फुरने से शीघ्र ही द्वैत की तरह हो जाता है। जो कुछ साकाररूप जगत देख पड़ता है, सो सब विराट आत्मा है। इससे अपने में इस प्रकार विराट की भावना करो कि यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मेरी देह है, हाथ, पाँव, नख, केश है। मैं ही प्रकाश रूप एक देव हूँ। नीति इच्छादिक मेरी शक्ति है। सब मेरी ही उपासना करते हैं। जैसे स्त्री श्रेष्ठ भर्ता की सेवा करती है, वैसे ही शक्ति मेरी उपासना करती है। मन मेरा द्वारपाल है जो त्रिलोकी का निवेदन करने वाला है। चिन्तन मेरा आने-जाने वाला प्रतिहारी है। नाना प्रकार के ज्ञान मेरे अंग के भूषण हैं। कर्मेन्द्रियाँ मेरे दास, ज्ञानेन्द्रियाँ मेरे गण हैं ऐसा मैं एक अनन्त आत्मा, अखण्डरूप, भेद से रहित अपने आप में स्थित परिपूर्ण हूँ।
इसी भावना से जो पूजा करता है वह परमात्मदेव को प्राप्त होता है। दीनता आदि उसके सब क्लेश नष्ट हो जाते हैं। उसे इष्ट की प्राप्ति में हर्ष और अनिष्ट की प्राप्ति में शोक नहीं उपजता। न तोष होता है न कोप होता है। वह विषय की प्राप्ति से तृप्ति नहीं मानता और न इसके वियोग से खेद मानता है। न अप्राप्त की वाञ्छा करता है न प्राप्त के त्याग की इच्छा करता है। सब पदार्थों मे उसका समभाव रहता है।
हे मुनीश्वर ! भीतर से आकाश-सा असंग रहना और बाहर से प्रकृति-आचार में रहना, किसी के संग का हृदय में स्पर्श न होने देना और सदा समभाव विज्ञान से पूर्ण रहना ही उस देव की उपासना है। जिसके हृदयरूपी आकाश से अज्ञानरूपी मेघ नष्ट हो गया है उसको स्वप्न में भी विकार नहीं होता।
हे महर्षे ! यह परम योग है। यही परम क्रिया है और यही परम प्रयोजन है। जो परम पूजा करता है वह परम पद को पाता है। उसको सब देव नमस्कार करते हैं और वह पुरुष सबका पूजनीय होता है।"

(श्री योगवाशिष्ठ महारामायण)




#Mahashivaratri is the festival to worship and propitiate Lord #Shiva, the Lord of all riches, the #Supreme Being, the all pervading, the very personification of Truth- #Absolute, #Consciousness- Absolute and Bliss-Absolute, the attributeless, the formless, the Supreme Lord of the universe. It was on the auspicious day of Mahashivaratri that jyotirlinga came into existence on earth; and this is the pious day of Lord Shiva's marriage too. As per the laws of Nature, it is the unique occasion when the stars and planets are conducive to the union of the individual consciousness of the #jiva with the Supreme Consciousness of Shiva and thus aid in the #realization of their essential #unity. Shiva means beneficence. Mahashivaratri is a night of supreme beneficence. Jap, austerities and #fast done on this day earn a thousand times more religious merits compared to that accrued from the same effort exerted on any other day - See more at: http://www.ashram.org/AboutAshram/Festivals/MahaShivratri/tabid/987/ArticleId/1105/Shivaratri-The-Supreme-Vrata.aspx#sthash.x4QzUhw9.dpuf
A photo posted by @ashram_org on


Bapuji rape yogvashishtha asaram ji

Bapuji sexual assault Asharamji Bapu




Significance Of The Physical appeance Of Lord Shiva
Shiva means the form of welfare & benediction. Lord Shiva is benedict towards the humanism, but also his physical form conveys a lesson to the society.

1) Shiva Ji resides in the peak of Kailash. This signifies thatwisdom always resides at the white peak i.e. top centers where as the ignorance resides in the lower centers. At the time of anger, fear, lust, sex , our mind, heart and soul comes down to the lower center of the body (Muladhar Kendra i.e. base of spine). If the mind & soul resides in top centers of the body then one do not fall prey sensual indulgence and carnal desires. The demigod of desires (Kam Dev) attacked Shiva Ji with an arrow, but with mere sight of Shiva Ji , the demigod burnt down into ashes. If you are also attacked by lust and desires, then come to the upper centers (i.e divert your mind and should towards the upper portion of the body) and then the those desires could not win.
2) The Kailash peak & Himalayan peak are white and Shiva Ji resides there. Similarly where Satvagun (moral values, ethics & good habits) resides there also resides AtamShiva (Supreme-Self).
3) Ganga springs out from the head of Lord Shiva. This means the wisdom springs out from the head of a learned & wise person. They have all those capabilities with which they resolve the critical & precarious issues very easily. 
4) Shiva Ji is adorned with the second-day moonon his head. This signifies that wise men greatly honor even the minute light and trivial qualities of others. Shiva Ji is treasure, reservoir of wisdom and that is why he does not dishonor any knowledge & wisdom instead respect it. 
5) Shiva Ji wears a garland of heads. Few scholars says that these heads are not common head instead are the heads of scholars & learned. In order to maintain the memory of those scholars who led their life with great knowledge, Shiva Ji wears the head garland. Some other philosophers says that Shiva Ji wears such garland to preach us that whether one is rich or poor, learned or uneducated, male or female but in the end of life , one has to leave this skull here(i.e physical body leaves here after death, and we are not physical body instead are pious souls). 
6) Shiva Ji has applied ash upon his body. This is to remind us that whatever status, post, luxury we acquire; whatever proud we are of; all those are lost after death. The ash on Shiva’s body intimates the final stage of our body. Thus remember this holy ash and abdicate the pride, endearment, affection & attachment and come to your inner soul and attain self-realization.
7) The other ornament wore by Shiva Ji is monstrous snakes.If a snake is alone, it is being killed but when it is with Shiva Ji, it is being worshiped. Similarly if ones only engage in the worldly activities then would definitely fail, instead if charges the mind with divine consciousness and resides in supreme-self and then perform the worldly actions which in turn would become the ideal activity.
8) Trident (Trishul) & Damaru ornate Shiva Ji. This implies that Shiva is not in control of the three Gunas (Sattvagun, Rajogun, Tamogun) instead keep them in his control and when become happy , he dances taking Damru in hand.
9) Some says that Siva Ji has an addiction to hemp. Actually he is addicted to “Bhuvan Bhang” i.e destroying the world. Hemp addicted people took only the word “Bhan” from “Bhuvan Bhang” and interpreted it as hemp and took this as excuse to consume hemp.
A good gardener is one who does the cleaning of the field regularly and uproots the weeds (unwanted plats). If he does not do that, then the garden would become a forest. Similarly Lord Shiva is a ideal gardener of this world who has the habit of destroying the evils around the world (Bhuvan Bhang). 
10) In the residence of Shiva ji, the animals of opposite nature (i.e. who usually are enemies to each other) live together with peace; for example Lion - ox, peacock-snake-rat, all stay together with happiness. Why? This is because of the parity and equanimity of Lord Shiva. Similarly one who has equanimity (Samata) in life (i.e. behaves, reacts equally in all kinds of situations); can enjoy and live happily in all kinds of inimical ambience. 
11) A wise person becomes happy seeing a rose and thinks “how good is this flower, which is spreading its fragrance being surrounded by thorns”. But an ignorant prosecutor would say “one flower and so many thorns! Is this the life, where happiness is little but filled with sorrows”. Thus one who is intellect and knows the Shivatattva (real meaning of Shiva), who leads life with equanimity; ponders that the supreme power who has blossomed the flower, has also created the thorns. The ultimate power that has given birth to happiness has also created the sorrows. Thus one who observes happiness and sorrows equally and do not get flown away by them, will definitely achieve the self-realization i.e would get into the root of everything as Lord Shiva.

These great men who have attained self-realization i.e have drowned their mind and souls in ShivaTattva (Real meaning of Shiva) are antique and wonderful. But who just observes the physical form of Lord Shiva could celebrate the actual Shivratri by understanding the above meaning of Lord Shiva.



ॐ ॐ गुरूजी ॐ